कहाँ लुप्त हो गए…

कहाँ लुप्त हुए वो अमन चैन के दिन,

जब जीवन की न कर सकते थे परिकल्पना प्रेम बिन,

जब जीवन लगता था सारगर्भित,

जब सनेह के पुष्प होते थे पल्लवित,

जब मन में उठती थी उल्लास की तरंग

मानो आकाश में झूमती नाचती मस्त कोई पतंग,

सादा जीवन, प्रगाढ़ सम्बंध, सुंदर गीत,

बिना जीत के भी लगती थी तब अपनी जीत,

प्रकृति से अटूट नाता, सघन वन, नदियों का निर्मल जल,

भीतर बाहर न कोई कपट, द्वेष, न मल,

समय का वेग उस जीवन को ले गया कहाँ बहा,

सम्पन्न होते हुए भी लगे जैसे हाथ में कुछ नहीं रहा,

अभूतपूर्व प्रगति के इस दौर में मन क्यों जाता है बार बार डूब,

हृदय क्यों हो गए बंजर भूमि, क्यों हम जाते जल्दी ऊब,

क्यों लगता सब रीता-रीता, एक दूसरे से हो गए मीलों दूर,

ऊसर मरू भूमि सा हो गया जीवन जो हर्ष और आनंद से था भरपूर,

कहाँ ले आया हमें समय का रेला,

अजब सा इसने खेल है खेला,

निरुत्साहित निस्तेज हम जिसमें भटकें,

यह इस युग का है कैसा मेला?

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

14 thoughts on “कहाँ लुप्त हो गए…

  1. गजब का यथार्थ चित्रण किया है सर आपने।
    🙏🙏🙏💐💐💐

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    1. सब ईश्वर की कृपा और आपकी शुभकामनाएँ हैं, ममता मैडम! बहुत बहुत धन्यवाद!

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