जग में माँ जैसा है कौन,
सब बोलती वह रह कर मौन,
जो बन पाता सब कुछ करती,
बच्चों के लिए वह जीती मरती,
वह तो है एक अमूल्य निधि,
कर मिटने की वह जाने विधि,
माँ के हाथ से जो हम खाएँ,
उसका ऋण हम कहाँ से चुकाएँ ?
माँ है धरती पर उतरा एक फ़रिश्ता,
उससे है हमारा अनूठा रिश्ता,
कष्टों की बड़ी मार वह झेले,
चाहे कितने आएँ दुखों के रेले,
विषमताओं के उमड़ें चाहे कितने मेघ,
उसके प्रेम का कभी कम न हो वेग,
अपने बच्चों में है वह जीती,
वात्सल्य सुधा का रस वह पीती,
माँ की महिमा उसके रहते जानें,
तभी स्वयं को ज्ञानी मानें,
माँ है नभ मंडल का एक तारा
जिसने है हमारा जीवन संवारा!
माँ की न केवल महिमा गाएँ,
मात्र शब्दों से न मन बहलायें ,
अपनी माँ पे बलिहारी जाएँ,
वह हो तृप्त, परम सुख हम पाएँ!
अरुण भगत
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Well said sir❤
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Thank you, Sapna! God bless you!
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Nice Poem Sir👌👌
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Thank you, Adsu! Stay blessed.
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Arun sir ur poem is always a masterpiece ❤️
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Thank you very much, Sahil dear! Very nice of you to say so!
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Bilkul sahi 👍👌
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धन्यवाद, प्रियंका जी! खुश रहिए!
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वाकई मां पर बहुत बढ़िया कविता लगी सर। 👌👌👌
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धन्यवाद. ममता जी! मुझे ख़ुशी हुई की कविता आप को बढ़िया लगी!
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बेहद खूबसूरत✍️👏👏🙌👌 ,कविता…सर!
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धन्यवाद, श्वेता जी! खुश रहिए!
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