नस नस में है जो बसता

राम नाम तोते मानिंद बोले,

राम न पाया कोये,

अंतर्मन की जो आँख न खोले,

रहे पड़ा वो सोए!

राम तो है घट में विराजे,

सुंदर उसकी छवि है साजे,

अंदर उसकी ख़ुशबू फैले,

कहाँ जानें जो मन हैं मैले?

राम हमारे साथ हैं जगते,

साथ हमारे हैं वो सोते,

फिर हम क्यों बेचैन हैं होते,

क्यों हाथ मलते, क्यों हैं रोते?

नस नस में है जो बसता,

साथ है रोता, संग है हंसता,

उसे पाने को बाहर हैं फिरते,

एड़ी घिसते, पड़ते गिरते,

सब के अंदर जो एक रहता,

उसके नाम पे लड़ते फिरते!

मूढ़ मति हम भेद न पाएँ ,

जो अंग संग, उससे दूर हम जाएँ ,

जहालत के हैं जब बादल छाएँ ,

यूँ ही औंधे गिरें हम और यूँ ही हैं मुँह की खाएँ!

ऊपर नीचे, बाहर अंदर,

उसे ही देखे मस्त कलंदर,

उसी का सुनाई देता नाद चहूं ओर,

फिर भी हम क्यों न करते गौर?

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

11 thoughts on “नस नस में है जो बसता”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, प्रिया जी! अंतर्मन में बैठे राम को जानिए और आनंदित रहिए!

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