फिर भी चलता रहेगा यह कारवाँ

यह वक़्त का रेला,

यह ज़िंदगी का मेला,

तूँ ख़त्म हो चुकेगा,

फिर भी यह न रुकेगा,

न रहेंगे बाग़ और बाग़बान,

फिर भी चलता रहेगा यह कारवाँ,

हम सभी वक़्त की गर्द में जाएँगे खो,

इक गहरी नींद जाएँगे सो,

वक़्त का दरिया तो यूँ ही बहता रहेगा,

अपनी ख़ामोश ज़ुबान में बहुत कुछ कहता रहेगा,

मदमस्त हम, वक़्त रहते कहाँ कुछ सुनेंगे,

कहाँ हम थमेंगे, कहाँ कुछ गुनेंगे?

कितना भी हो गुमान, वक़्त का रेला तो ले जाएगा बहा,

पता भी नहीं होगा, हो जाएँगे हवा,

हमें हो या न हो मंज़ूर,

यही ज़िंदगी का अदब, यही दस्तूर!

वक़्त का हिसाब तो है सीधा और साफ़,

न कभी किया है, न कभी करेगा हमारी गुस्ताखियों को माफ़!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

16 thoughts on “फिर भी चलता रहेगा यह कारवाँ”

  1. बाहर खूब प्रोफेसर साहब। समय तो अनंत और अनादी है। हम तो इस समय के चक्र में एक छोटी सी भूमिका अदा कर के लुप्त हो जाते हैं। परंतु कई बार हम भूल जातें है ये जीवन क्षण भंगुर है। इस लिए ये आवश्यक कि हमें इस तथ्य का एक एहसास रहे और हम अपने कर्मों पर सदा नज़र रखें।

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    1. बिलकुल सही कह रहे हैं आप, जोगेश भाई! कविता के तत्व को सराहने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

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  2. बिल्कुल सही सर। वक्त किसी के लिए नहीं रुकता चाहे कोई इस दुनिया में आए या जाए। वक्त अपने हिसाब से चलता ही रहता है।

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    1. धन्यवाद, राशी! जीवन तो चलायमान है और वक़्त के रेले में सब बह जाते हैं! लेकिन बात यह महत्वपूर्ण है कि जो और जितना जीवन मिला है उसका हम क्या करते हैं!

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