होली है,भई, होली है

होली का त्योहार,

सुंदर हो व्यवहार!

सुंदर हो व्यवहार,

रंगों से सब को नहलायें,

प्रेम का जामा ओढ़ कर

सब को गले लगाएँ!

सब को गले लगाएँ,

यही कहती होली की रीत,

बिसार दें उस बात को

जो कब की गयी है बीत!

जो कब की गयी है बीत,

उसे छोड़ बढ़ें अब आगे,

जीवन है नित नया,

नयी उसकी बुनती, नए उसके धागे!

नयी उसकी बुनती, नए उसके धागे,

यही है जीवन का सार,

फिर क्यों वैमनस्य और अलगाव का

हम ढोते फिरते भार!

आओ इस होली पर

मानें सब को अपना मीत,

यही हमारी शोभा, यही हमारी जीत,

यही हैं सच्चे इस उत्सव के रंग,

आओ खेलें होरी सब को लेकर संग!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

18 thoughts on “होली है,भई, होली है”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, स्नेहलता जीं! यह आपकी समझदारी है कि आप हर कविता में से कोई न कोई सीख ढूँढ लेती है!

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  1. बेहतरीन कविता✍️👌😍….
    🙏होली की मंगल शुभकामनाएं…सर!🙏🌈💦🔫🎉

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    1. धन्यवाद, श्वेता जी! खुश रहें और होली के पावन उत्सव का भरपूर आनंद लें!

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  2. बहुत सुंदर लिखा है Sir,
    होली प्यार और भाईचारे का संदेश देती है,
    आपकी हर कविता, कुछ खास संदेश देती है।
    होली की हार्दिक शुभकामनाएं Sir🙏🙏💐💐💐

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, मीनाक्षी जी! यह आपकी अच्छाई है कि आप ऐसा सोचती हैं! एक बार फिर होली की शुभकामनाएँ!

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  3. बेहतरीन कविता✍️👌😍….
    🙏होली की मंगल शुभकामनाएं…सर!🙏🌈💦🔫🎉

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, सपना! होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ! खुश रहिए!

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  4. अति सुन्दर, प्रोफेसर साहेब! आप को भी होली की शुभ कामनाएं! आपकी कविता का संदेश बहुत सुंदर है। होली का त्यौहार हमें एक नयी शुरूवात का संदेश देता है जिसमे हम अपने सब वैर भाव को त्याग कर प्रेम के पथ पर अग्रसर हों।

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    1. कविता के भाव को सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, जोगेश भाई! होली मुबारक हो!

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