बुलंद कर अपनी हस्ती को

न मचा बेवजह बवाल,

तूँ बन बेमिसाल!

छू ले बुलंदियाँ आसमाँ की,

बता दे कहाँ तक पहुँच है इंसान की!

तोड़ ला आसमान से तारे,

फहरा दे अपना परचम जहां में सारे!

समुंदर की तहों से निकाल ला बेशक़ीमती मोती,

हंसा दे तूँ ज़र्रे ज़र्रे को जहां भी यह ज़मीन है रोती!

ऐसा हो तेरा हौंसला, सच के लिए ऐसी तक़रीर,

जिससे जाग उठे किसी का भी सोया हुआ ज़मीर!

न झुक झूठ के सामने, तूँ सर उठा के जी,

सुध ले उन सब की जिनकी फ़िक्र किसी ने न की!

बन मसीहा तूँ , दुनिया को सही रास्ता दिखा,

जो नेक सीख से हैं महरूम, उन्हें उम्दा कुछ सिखा!

न तेरे में कोई बेमानी ज़िद हो, न फ़ालतू की अकड़,

बेहतरीन हस्तियों ने रोशन किया जिसे, उस राह को तूँ पकड़!

कारगर हो तेरी ज़िंदगी, बेमिसाल रंग उसमें भर,

बुलंद कर अपनी हस्ती को, न रश्क किसी से कर!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

22 thoughts on “बुलंद कर अपनी हस्ती को”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका, श्वेता जी, आपकी उम्दा टिप्पणी के लिए! जीती रहिए!

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  1. बहुत ही बेहतरीन और प्रेरक शील कविता लगी। सर🙏💐👌

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता जी! जान कर प्रसन्नता हुई कि आपको कविता अच्छी लगी!

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