उच्च जीवन

हो एक व्यापक दृष्टिकोण,

सोच न संकुचित हो, न हो गौण!

सागर सा हो हृदय विशाल,

न कोई द्वेष, न मलाल!

जीवन के प्रति हो उमंग,

मन में उठती हो तरंग!

दामिनी की भाँति धमनियों में दौड़ता हो रक्त,

आभा ऐसी जिसे लखने थम सा जाए वक़्त!

जीवन मूल्यों के प्रति हो अपार निष्ठा,

जिससे सहज ही बढ़ती जाए प्रतिष्ठा!

मन हो निर्मल, अंतरात्मा हो शुद्ध,

जैसे भीतर ही विराजमान हो गए हों बुद्ध!

प्रेम पथ सतत विस्तार हो,

जड़ चेतन के प्रति श्रद्धा अपार हो,

स्व:जीवन प्रेरणा का स्तोत्र हो,

ओज से ओतप्रोत हो,

संतुलित विकास हो,

दिव्य ज्ञान का प्रकाश हो,

प्रखर ललाट हो,

बुद्धि के खुले कपाट हों,

चरित्र अविस्मरणीय हो,

जीवन अनुकरणीय हो,

गुण हों अपार, प्रतिभा विलक्षण,

यही हैं उच्च जीवन के लक्षण!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

21 thoughts on “उच्च जीवन”

    1. Thank you very much, Snehlata Ji! If the poem has worked as a tonic for mental strength, so much the better. We need all the mental strength we can muster in life, don’t we? God bless you!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, प्रियंका जी, अभिव्यक्ति की सराहना के लिए! खुश रहिए!

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  1. अनुकरणीय कविता। बहुत सुंदर कविता लगी सर
    बहुत-बहुत धन्यवाद सर 🙏🙏💐💐💐

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता जी! इसी तरह पढ़ते रहिए और उत्साहित करते रहिए!

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  2. बहुत ही सुंदर लिखा है सर आपने । हम इन सब खूबियों को अपने जीवन में लाने की कोशिश करेंगे। 😊

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    1. धन्यवाद. राशी! जीवन श्रेष्ठता की ओर बढ़ने का की नाम है! ऐसा हमारा सतत प्रयास रहना चाहिए!

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