कौन सुलझा पाया है ये उलझे हुए ताने बाने?

यह संसार है एक सपना,

क्षणभंगुर है जो भी लगे अपना!

ज़िंदगी रेत सी हाथों में से छनती जाती

पर यह बात सुनने में है किसको भाती?

न जाने यह बुलबुला कब फूट जाए,

साँसों की लड़ी कब टूट जाए,

कब जीवन की गाड़ी अपने आख़िरी पड़ाव पर रुक जाए,

ज़िंदगी मौत के आगे झुक जाए,

कब इस सुबह की हो जाए शाम,

जो कुछ ख़ास नहीं, रोज़ होने वाली है बात आम!

सारी ज़िंदगी हम निजी अमरत्व के झूठ को पकड़ बैठे रहते,

सच जानते हैं पर खुद को भी नहीं कहते,

यह छलावा लगे हमें प्यारा कि हम तो यूँ ही जिए जाएँगे,

ज़िंदगी के कशिश भरे जाम यूँ ही पिए जाएँगे!

क्यों करते रहते हैं हम ऐसा,

क्यों सच को नहीं देखते वह है जैसा?

क्योंकि जानते हैं कि ज़िंदगी के बाद है एक शाश्वत मौन,

फिर किस लम्बे सफ़र पर निकलना है यह जाने कौन?

फिर कोई सफ़र है भी या नहीं, यह कौन जाने?

यह है तो एक गहरा राज़, कोई माने या न माने!

कौन सुलझा पाया है ये उलझे हुए ताने बाने?

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

13 thoughts on “कौन सुलझा पाया है ये उलझे हुए ताने बाने?”

  1. True ! We make mistakes/ We Become cruel…

    Why ?

    Because we forget the truth of life – God and Death.

    We often forget that we are under GOD’s CCTV 24*7

    Thanks for sharing the beautiful thoughts…

    ❤❤❤❤❤❤❤❤

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  2. बिल्कुल सही फरमाया सर आपने
    कोन सुलझा पाया है यह उलझे हुए ताने बाने ?👌👌👌🙏🙏🙏

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    1. धन्यवाद, ममता जी! ये ताने बाने सुलझाना कोई आसान नहीं लेकिन जीवन के अंतिम सत्य को आत्मसात् करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए!

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  3. Awesome lines sir🥰🥰🥰True ! We make mistakes/ We Become cruel….because we forget the truth of life – God and Death.

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