आओ कुछ तो करें तुम्हें ख़ुदा का है वास्ता

आसान नहीं, मुश्किल है इस ज़माने में जीना,

कहाँ मुमकिन है चाक दामन को सीना!

अपनी रूह पे लगे पैबंद कैसे छुपाएँ,

रोते सिसकते हुए मन को कैसे हसाएँ?

कैसे बदलें इस वक्त की बेनूरी को नूर में,

कैसे पाएँ सकूँ झूठ मूठ के सरूर में?

कैसे बंजर ज़मीन पर उगाएँ प्यार की फसल,

कैसे झूठे नक़ली इंसानों में ढूँढें कुछ असल?

कैसे बेज़ारी के आलम में दिलाएँ किसी को भरोसा,

कैसे लौटा लाएँ उस ईमान को जिसे इस बेमुरव्वत दौर ने है खोंसा?

बिन पेंदे के लोटों की तरह हो गये हैं लोग,

मौक़ा परस्ती का लग गया है सब को रोग!

लालच और हवस की आग में दुनिया हो रही है राख,

न बचा किसी का ईमान, न रही है साख!

वहशीपन के इस जंगल में आओ ढूँढें कोई रास्ता,

आओ कुछ तो करें तुम्हें ख़ुदा का है वास्ता!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

8 thoughts on “आओ कुछ तो करें तुम्हें ख़ुदा का है वास्ता”

  1. वाह प्रोफ़ेसर साहब। लोगों की ज़मीर जगाने का एक सूंदर प्रयास।

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    1. अच्छे के लिए कुछ न कुछ कोशिश करते रहना चाहिए, जोगेश भाई! आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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