चलो क्षितिज के उस पार

चलो क्षितिज के उस पार,

जहां हो स्नेह और शांति अपार,

जहां न हो कोई विषम अभाव,

जहां न हो बाहुबलियों का दुष्प्रभाव,

जहां न हों लोग न्याय के लिए सिसकते,

जहां न हों भूखे बच्चे रोटी के लिए बिलखते,

जहां न हो अशोभनीय बंदर बाँट और खींचा तानी,

जहां दूध का दूध हो और पानी का पानी,

जहां चारों ओर विचरते हों शांति दूत,

जहां स्वाभिमान से जीते हों इस सृष्टि के पूत,

जहां इंसान इंसान से न रखता हो वैर,

जहां सब हों अपने, कोई न हो ग़ैर,

जहां न हो ज़ोर ज़बरदस्ती, न व्यभिचार,

जहां व्याप्त हो हर ओर सदबुद्धि , सुविचार,

जहां बहती हो सद्भाव और प्रेम की नदी,

जहां हर पल न लगे जैसे एक सदी,

जहां अहंकार न करता हो तांडव नृत्य,

जहां हर दिन न होते हों बर्बर जघन्य कृत्य,

जहां विषय वासनाएँ न सर चढ़ कर बोलें,

जहां हर कोई हर चीज़ को स्वार्थ के तराज़ू पे न तोले,

जहां अवसर हों, अवसरवादिता न हो,

ऐसी दुनिया सब को प्यारी लगे जो,

जहां हर कोई चैन से है जिए,

जहां हर कोई आनंद का सोम है पिए,

जहां सब को बांधती हो रचनात्मकता की डोर,

जहां हर कोई बढ़ जाए पूर्णता की ओर,

चलो क्षितिज के उस पार,

जहां उत्कृष्ट स्वपन होते हों साकार!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

20 thoughts on “चलो क्षितिज के उस पार

    1. Thanks a lot for your warm appreciation, Snehlata Ma’m! Yes, let us all hope and pray that this world becomes much better than we find it today. Let us also do our own bit to make it better. Stay blessed.

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  1. ‘चलो क्षितिज के पार’ कविता बहुत ही सुंदर और सशक्त रचना लगी।
    बहुत-बहुत धन्यवाद सर। 🙏🙏🙏💐💐💐

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता मैडम! यह आपकी अच्छाई है कि आप ऐसा कह रही हैं!

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