चल कदम बढ़ा,
कहीं रह जाए न खड़ा,
गतिमान बन, कीर्तिमान बन,
कहीं रोक न ले तुझे तेरा मन!
कर्म की तूँ कर उपासना,
बाधा न बने कोई विषय वासना,
हर कर्म हो तेरा निष्काम,
ध्येय हो उच्च और भावना निष्पाप,
कर्म ही स्वयं में श्रेष्ठ फल,
न दे उसके परिणाम पर बल,
उच्च कर्म ही लगाए तेरा बेड़ा पार,
न बैठ थक कर, न मान हार,
जीवन पथ पर जो आगे बढ़ता जाए,
परम आनंद को वही है पाए!
निश्चल, अविरल और विरक्त,
कर्म योग है यही सशक्त!
यही गीता का है सार,
यही कराए भवसागर पार!
अरुण भगत
Bhut hi sundar panktiya, sir ji!
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बहुत बहुत धन्यवाद, विजय लक्ष्मी! अच्छा लगा कि पंक्तियाँ आप को अच्छी लगीं!
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Well said sir🌸🌸🌸🌸❤
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धन्यवाद, सपना! खुश रहिए!
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बहुत सुंदर Sir ji❤️❤️
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धन्यवाद, आडसु! ख़ुशी हुई कि आपको कविता सुंदर लगी!
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बहुत ही सुंदर कविता है सर। । हमें अपना कर्म करते चले जाना चाहिए बिना फल की कामना किए । हमेशा कर्मशील बने रहना चाहिए ताकि हम उन्नति की ओर बढ़ते चले जाए ।
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धन्यवाद, राशि! बिलकुल सही कहा आपने! सद्कर्म करते रहें और उन कर्मों को प्रभु चरणों में अर्पित करते रहें, नि:स्वार्थ कर्म में ही हमारा कल्याण निहित है!
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Very inspiring & motivational poem Sir!!!!!
Just superb 👌
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धन्यवाद, नेहा जी! कुछ न कुछ प्रेरणादायक होता रहना चाहिए, नहीं तो जीने की उमंग कहाँ से लाएँगे?
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Ati sunder panktiyan sir…
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धन्यवाद, प्रिया जी! आशा है पंक्तियों के पीछे जो भाव है वह भी आपको सुंदर लगा!
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बहुत ही सुन्दर सर!
कर्म की अत्यंत ही सरल,सरस व ह्रदय ग्राही व्याख्या! उन्नत व श्रेष्ठ रचना!
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धन्यवाद, सरोज जी! एक श्रेष्ठ व्यक्ति ही ऐसा कह सकते हैं! दिल से धन्यवाद!
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