कब छटेगा यह अंधेरा और देखेंगे हम एक नई भोर?

भावनाओं के स्तोत्र सब सूख गए,

मन से मन के ताने बाने सब टूट गए,

इंसान हो गया इंसान से कोसों दूर

इंसानियत रह गयी ठगी और मज़बूर,

मन से सब होते जा रहे बीमार,

एक दूसरे को प्यार करने से लाचार,

फिर भी अपने स्वार्थ की बेड़ियाँ न तोड़ पाएँ,

अपने बेतुके अहंकार को न छोड़ पाएँ,

शायद ऐसे ही अपनी नियति को हम जी रहे,

रस विहीन जीवन के कड़वे घूँट पी रहे,

अविश्वास का विश पान हम कर रहे,

एक दूसरे से कट रहे और डर रहे,

गिरते जा रहे अपने बनाए अंध कूप में,

दिख रहे सब को अपने विकृत रूप में,

लोभ मोह का अजगर हमें जकड़े जा रहा,

न किसी का मन खिले, न कोई चैन पा रहा!

देखते ही देखते समय ने ली कैसी करवट,

विषय विकारों के घोड़े दौड़ पड़े हैं सरपट,

कौन जाने कब ख़त्म होगा यह मुश्किल दौर,

जिसका न ठिकाना समझ आए, न कोई ठौर,

कब प्यार से बाहें फैलाएगा इंसां इंसां की ओर,

कब छटेगा यह अंधेरा और देखेंगे हम एक नई भोर?

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

24 thoughts on “कब छटेगा यह अंधेरा और देखेंगे हम एक नई भोर?

  1. Sir aapki lekhni vakaai bahuut sunder h
    Ek ek shabd me सच्चाई h ।
    जब तक अहम कम नहीं होगा तब तक ऐसे ही चलेगा सर

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    1. धन्यवाद, रचना जी! सब ईश्वर की कृपा और आप जैसे प्यारे बच्चों की शुभकामनाएँ हैं!

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    1. धन्यवाद, सुरभि जी,कविता को पढ़ने और उसके विचार को अनुमोदित करने के लिए!

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    1. बिलकुल ठीक है, प्यारे! प्रभु नाम तो राम बाण है! लेकिन प्रभु प्रेम भी सब के बस का कहाँ है?

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    1. धन्यवाद, सपना जी! पर मुझे और अच्छा लगेगा अगर हिंदी की कविता पर टिप्पणी आप हिंदी में ही करें !

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    1. धन्यवाद, मुक्ता जी! आपने कविता पढ़ी और पढ़ कर respond भी किया यह मुझे बहुत अच्छा लगा! खुश रहिए!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, विजय लक्ष्मी! मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि रचना आपको अच्छी लगी!

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  2. This perplexed state of the lost generation is really painful. We need to transform it into the welcome generation indeed. Very apt and pithy Sir

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  3. आज का सच है सर जी । आपने बहुत सुंदर शब्दो मे लिखा है ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, अजय प्यारे, कि रचना आपको यथार्थवादी और अच्छी लगी! खुश रहिए!

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