ज़िंदगी की राहों पे तूँ चला चल
ज़िंदगी की राहों पे तूँ चला चल,
बेबस हो कर तूँ हाथ न मल!
ज़िंदगी है चलने का नाम,
इसमें रुकने का क्या काम?
बढ़ आगे और जीत का परचम फहरा,
झूम तूँ और मस्ती में लहरा!
जीत तूँ ख़ुद से और खुदी को कर बुलंद,
जान ले तूँ की खुदा को भी यही है पसंद!
घुट घुट के न जी ,
बुलंद हौंसलों का जाम तूँ पी!
बेख़ौफ़ हो जी, हर ख़ौफ़ से लड़,
मरने से पहले यूँ सौ बार न मर!
ज़िंदगी है इक नेमत, इसे यूँ न गवाँ,
कौन जाने कब यह हो जाए हवा?
इक बेशक़ीमती मौक़ा है यह,
इसका तूँ एहतराम कर,
कर ख़ुद और खुदा की बंदगी,
सकूँ से जीना चाहता है गर!
अरुण भगत
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Owsm lines sir👌👌👌😇😇😇😇😇
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Thank you, Sapna Ji! Stay blessed.
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Beautiful penned down Sir,
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Thank you very much, Snehalata Ma’m! All God’s grace!
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Beautiful lines!!!!
Superb Sir!!!
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Thank you, Neha Ji! I find your attitude as a reader simply superb. Thanks once again.
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Bhot khoob sir👌
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बहुत बहुत धन्यवाद, प्रिया जी! प्रसन्न रहिए!
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