गुरु बिन कैसे हो गति?

गुरु बिन कौन दे ज्ञान,

गुरु बिन कैसे हो सत्य की पहचान,

गुरु बिन कौन जो पार लगाए,

और सच का है अर्थ सिखलाए,

गुरु बिन कैसे हो गति,

गुरु बिन कौन दे सके है सन्मति?

गुरु बिन नाहीं कोई ठौर,

गुरु हैं जीवन पतंग की डोर!

गुरु देत संस्कार की निधि,

गुरु बतलाते जीवन की विधि,

तिमिर का कर देते वे नाश,

चहुं ओर हो जाता प्रकाश!

गुरु हैं जैसे ठंडी छाँव,

क्यों न लगिए उनके पाँव?

अपने गुरु पे बलिहारी जाएँ,

गोविंद से जो हैं मिलाएँ!

गुरु के करते जो गुण गान,

होते यशस्वी, पाते मान,

गुरु की शरण में जो जाते,

शाश्वत सत्य की निधि वे पाते!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

23 thoughts on “गुरु बिन कैसे हो गति?

  1. बहुत उम्दा कविता है सर। गुरु के बिना एक शिष्य और शिष्या अधूरे हैं। गुरु ही हमें हर अच्छी – बुरी चीज़ से अवगत कराते हैं। हम बहुत खुशनसीब हैं हैं सर कि हमें आप जैसे गुरु मिले।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, राशी जी! मैं स्वयं के बारे में तो नहीं जानता लेकिन यह अवश्य जानता हूँ की जीवन में गुरु का महत्व क्या है!

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  2. प्रशंसनीय कविता अरुण जी, बहुत सटीक लिखा है, गु +रू का अर्थ ही अंधकार को हरना

    God bless🙏

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  3. बहुत अच्छी कविता लगी गुरुजी
    सच में गुरु की महिमा अपरंपार है।
    🙏🙏🙏💐💐💐

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता जी! गुरु का महत्व वही जानता है जिसका जीवन गुरु ने प्रकाशमान किया है!

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  4. बहुत अच्छी कविता लगी गुरुजी
    सच में गुरु की महिमा अपरंपार है।
    🙏🙏🙏💐💐💐

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  5. गुरु की महत्ता तथा महिमा का अति सुंदर विवरण, प्रोफेसर साहब।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, भाई! गुरु की महिमा का जितना गुणगान किया जाए उतना ही कम है!

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