प्यार से इक दूजे को मिलो,
और फूलों की तरह खिलो,
इक दूजे का एहतराम करो,
यूँ न बेवजह घुट घुट के मरो,
यूँ न बेशक़ीमत ज़िंदगी को करो ज़ाया,
न पड़ने दो इस पे इस पे अपनी खुदगर्जियों का साया,
अपनी वीरानियों से खुद को आज़ाद करो,
यूँ न बेमक़सद मौत से पहले मरो!
ज़िंदगी न मिलेगी दुबारा,
फिर क्यों नहीं है तुम्हें ये गवारा?
बड़ी मशक़्क़त के बाद पाया है जिसे,
जियो खुल कर प्यार और एतबार से इसे,
कौन जाने फिर किसी से कोई मिले या न मिले ?
फिर किस बात के शिकवे और गिले ?
अरुण भगत
बहुत खूब Sir👏👏🙏🙏
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बहुत बहुत धन्यवाद, मीनाक्षी मैडम! खुश रहिए!
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❤❤❤❤❤❤❤💯💯💯💯💯💯💯💯💯💯💯
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Thank you very much, Shivam! Stay happy.
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बहुत ही सुंदर पंक्तियां सर
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बहुत बहुत धन्यवाद, छविल! जीते रहो!
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सुंदर पंक्तियां गुरुजी
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Bhot khoob sir..
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S
धन्यवाद, प्रिया, आपकी उदार सराहना के लिए!
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बेहद सुंदर कविता है सर । इतनी मुश्किल से हमें ये जीवन मिला है तो हम इसे खुल के जीना चाहिए।
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बिलकुल अच्छे से खुल के जीना चाहिए, राशी! अगर कविता सुंदर लगी है तो ज़िंदगी को भी उसी सुंदरता से जीना चाहिए!
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Wonderful poem sir!❤
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Thanks a lot, Vijay Laxmi, for your good and warm response! Be happy.
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