When I look at my nonagenarian father, I am quite amazed rather, With many a remarkable feature, He is doubtlessly a great teacher, His remarkable will to live Does all of us a valuable lesson give That it is will that does a human drive, It is tenacity that makes one live and thrive, AsContinue reading “When I Look at My Nonagenarian Father”
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प्रभु को अपना खेवट बनाओ
विषय-विकारों से होकर वंचित, अच्छाई को करके संचित, भले मानस बन जाओ, चिरकाल तक सुख पाओ, विषय-विकार और राग-द्वेष, यह सब हैं झूठे परिवेश, कीचड़ में खिलो कमल की भाँति, पाओ परम आनंद और शांति, मन जिसका है निर्मल धारा, वासनाओं से वह कभी न हारा, निर्मल हृदय में प्रभु का वास, भोले पंछी केContinue reading “प्रभु को अपना खेवट बनाओ”
करें जागृत भीतर के बुद्ध
जीवित होने का उत्सव मनाएँ, प्रेम की अविरल गंगा बहाएँ, सब को अपने गले लगाएँ, जीवन-सार समझें-समझाएँ, जीवन का हर पल अनमोल, कौन है जाने इसका मोल, पल में है जीवन अपार, पल में हो हो जाए बेड़ा पार, इस क्षण की महिमा जिसने जानी, वही पंडित और वही है ज्ञानी, पल में प्रगट होतीContinue reading “करें जागृत भीतर के बुद्ध”
इससे बहुमूल्य न कोई युक्ति
मोह माया सब त्यागिए, लोभ, मोह, अहंकार, गहन निद्रा से जागिए, तजिये सर्व विकार! तजिये सर्व विकार, हर बंधन से मुक्ति पाइए, रखिए सदा सुविचार, मेहनत का ही खाइए! मेहनत का ही खाइए, आत्मा रहेगी तृप्त, कुमार्ग पर न जाइए, कुसंगत में न होइए लिप्त! कुसंगत में न होइए लिप्त, इस बात को विचारिए, चलाContinue reading “इससे बहुमूल्य न कोई युक्ति”
कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर
यह ज़िंदगी का मेला, है क़िस्मत का खेला, या समय का है रेला जिसमें सब कुछ बह जाता, कुछ समझ नहीं आता, कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर, यह ले जाए हमें किस ओर, कभी लगे बहुत कुछ है अपना, कभी सोचें, सब है सपना, कभी लगाएँ इसको गुहार, कभी लगे जैसे रही हो दुलार,Continue reading “कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर”
आओ फिर बच्चे बन जाएँ
आओ फिर बच्चे बन जाएँ, चंदा मामा से बतियाएँ, उड़ें पवन के साथ डाल हाथों में हाथ, कोई भेद-भाव न जानें, सबको अपना ही मानें, अभी रूठें, , अभी मन जाएँ, सबसे प्यार हैं पाएँ, बालक बन जाएँ अबोध, फैलाएँ हर्ष और प्रमोद, फिर से पक्के दोस्त बनाएँ, एक-दूजे पे वारी जाएँ, बीती बात काContinue reading “आओ फिर बच्चे बन जाएँ”
ए रब, हमें ले चल उस दुनिया में वापिस
खुद से क्या चाहिए मुझे मैं खुद ही न जानूँ, है दिल में कोई ख़लिश, मैं खुद ही न मानूँ, बे नूर सा क्यों लगे मंज़र, कौन है यह जाने, म्यानों से बाहर निकले हैं ख़ंजर, हवा में हैं गिले-शिकवे और ताने, इंसान इंसान से पाले वैर, हर कोई लगे है ग़ैर, फ़िज़ा में घुलContinue reading “ए रब, हमें ले चल उस दुनिया में वापिस”
खुद से मुँह कौन मोड़ सका है?
खुद से दूर भाग कर कहाँ जाएँगे, खुद से दूर जा कर क्या पाएँगे, खुद से दूर भाग कर जा सकते कहाँ, जहां भी जा छुपेंगे, खुद को पाएँगे वहाँ, खुद से मुँह कौन मोड़ सका है, खुद से नाता कौन तोड़ सका है, खुद से अगर होंगे ख़फ़ा, तो किसी से न कर पाएँगेContinue reading “खुद से मुँह कौन मोड़ सका है?”
फ़िज़ा में घुला ज़हर
फ़िज़ा में घुला ज़हर, कुदरत ने बरसाया क़हर, साँस-साँस को हुए मोहताज, जो खुद को समझें सरताज, धुएँ और गर्द के जिन्न खड़े मुँह बायें, कुछ समझ न आए हम कहाँ जाएँ, यह हमारा ही तो किया-कराया है, कुदरत को हमने समझा पराया है, खुद को हमने जाना आला, खुद ही तो बुना अपनी बर्बादीContinue reading “फ़िज़ा में घुला ज़हर”
When Will We Wake?
Thoughtless crowds surge, Bodies with bodies merge, There is jostling mad, Portends a situation grim and bad, Precious lives at stake, When will we wake? Tragedies waiting to happen every day, Can we out of this sorry mess find our way? A small trigger, the berserk crowds go to meet a terrible end, When willContinue reading “When Will We Wake?”