वक़्त अच्छा भी आएगा,
फिर सब कुछ भाएगा,
फिर बजेगी मन की तार,
फिर थिरकेंगे पाँव,
फिर झूमेगी मस्त पवन
सपनों की होगी उन्मुक्त उड़ान,
लहराएँगे उम्मीदों के फिर परचम!
बस्तियाँ होंगी फिर आबाद,
फिर कहकहे गूंजेंगे,
फिर महफ़िलों के दौर चलेंगे,
फिर सजेंगी बारातें,
फिर मिलेंगे हम सब गले
जब मौत के मंडराते सायों से
हम आख़िर होंगे आज़ाद!
जो हमसे बिछुड़ गए हैं
उन्हें करेंगे नमन सादर
और फिर बढ़ जाएँगे
इस जीवन पथ पर
गले लगाने एक नयी सुबह को,
भरने नये नये रंग
नये जोश के संग!
अरुण भगत