आगे दौड़, पीछे चौड़ ,
कैसी लगी है जग में होड़?
अंधी दौड़ में सब सरपट भागे,
बिखर गए हैं सब धागे!
टूट गया सब ताना बाना,
किसी का मर्म न कोई है जाना!
किसी की पीड़ा कोई न जाने,
हर कोई अपना दर्द है माने!
गिरते हुए को कोई न उठाए,
हर कोई उल्टा पाठ पढ़ाए!
मुख से करते राधे-राधे
हर कोई अपना स्वार्थ है साधे!
हर कोई अपने लोभ से लिपटा,
हर कोई अपने आप में सिमटा!
मन की कोई मन न जाँचे,
तन की महिमा हर कोई बांचे!
सब जकड़ें है मोहपाश में,
सब फँसे हैं छद्म जाल में!
हर कोई अपने नशे में झूमे,
यूँही समय का चक्का घूमे!
अरुण भगत