दबी हुई सिसकियों का शोर है काफ़ी

फ़िज़ाओं में घुलता ज़हर कुछ बोल रहा है, रिश्तों का घुटता दम कुछ बोल रहा है, क़हर बरपाया है जिस कुदरत पे वह बहुत कुछ सह रही है, इंसान की इंसान से बेज़ारी बहुत कुछ कह रही है! मरते हुए एहसास भी कुछ बोल रहे हैं, डरे हुए अल्फ़ाज़ भी कोई गिरह खोल रहे हैं!Continue reading “दबी हुई सिसकियों का शोर है काफ़ी”

बुलंद कर अपनी हस्ती को

न मचा बेवजह बवाल, तूँ बन बेमिसाल! छू ले बुलंदियाँ आसमाँ की, बता दे कहाँ तक पहुँच है इंसान की! तोड़ ला आसमान से तारे, फहरा दे अपना परचम जहां में सारे! समुंदर की तहों से निकाल ला बेशक़ीमती मोती, हंसा दे तूँ ज़र्रे ज़र्रे को जहां भी यह ज़मीन है रोती! ऐसा हो तेराContinue reading “बुलंद कर अपनी हस्ती को”

न अपनों से कर गुज़ारिश कोई

न अपनों से कर गुज़ारिश कोई, फिर अपनेपन का भरम नहीं रहता, न कर ज़ुबान का इस्तेमाल ज़्यादा, फिर ज़हानत का भरम नहीं रहता, न खैंच किसी बात को बहुत ज़्यादा, फिर वापसी का कोई रास्ता नहीं रहता, न तोड़ किसी के भी नाज़ुक दिल को, फिर जोड़ने का कोई ज़रिया नहीं रहता ! नContinue reading “न अपनों से कर गुज़ारिश कोई”

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