लाँघ सब सीमाओं को
तूँ हो जा विस्तृत,
नहीं बना तूँ पराजय हेतु
न होने को तिरस्कृत!
अपने बंधन खोल कर
तूँ हो जा मुक्त,
जान ले, असीम सम्भावनाओं से
सदा से है तूँ युक्त!
विशालता है तेरी पूंजी
अमरत्व तेरा गंतव्य,
विचलित न हो इस पथ से
यही है तेरा कर्तव्य!
निश्चय कर आगे बढ़ जा
प्रकृति होगी तेरे साथ,
थामने जागृत हस्त को तेरे
बढ़ेंगे हज़ारों हाथ!
बन प्रकाशपुंज नभ में
तूँ हो जा स्थापित,
देख तुझे मुक्त हो जायेंगे
हैं जो कुंठाओं से श्रापित!
अरुण भगत
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