ज़िंदगी

ज़िंदगी जीना आसान थोड़ी है 

कितने सवाल खड़े रहते हैं मुँह बाये

गहराते रहते है हैं कितने स्याह साये 

कितनी मंज़िलें देती रहती हैं सदायें 

कितनी चाहतें लेती रहती हैं बलायें 

वक्त थोड़ा, उम्मीदों की फ़ेहरिस्त लंबी

कहाँ मिले है कोई हमख्याल साथी संगी 

यूं ही भाग-दौड़ में ज़िन्दगी गुज़र जाती है 

रेत की मानिंद उँगलियों से फिसल जाती है 

यूं ही बिखरता जाता है बशर रेशा रेशा 

सपनों की डोर हाथ से निकल जाती है 

मंज़िलें कहीं दूर खड़ी मुस्कुराती रहती हैं 

इंसान की आँखें बस ठगी सी रह जाती हैं 

इक ख़लिश कर देती है दिल को तार-तार 

जब सहने पड़ते हैं दुश्वारियों के बे-रहम वार 

मगर फिर भी, यारो, ज़िंदगी है तोहफ़ा नायाब 

इसे नेकी और शिद्दत से जीना ख़ुद में है सबाब  

१. बशर= इंसान 

२. ⁠ख़लिश = चुभन 

३. ⁠दुश्वारियां= मुश्किलें 

४. ⁠नायाब = अनमोल 

५. ⁠शिद्दत से = पूरे दिल से 

६. ⁠सबाब = पुण्य 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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