सुनो—

सुनो, क्या बोलते हैं चाँद तारे ,

कुदरत के अद्भुत नज़ारे,

कुछ कह रही है हर शाख,

चिता की सुलगती राख ,

कुछ बोलता है बहता पानी

जिसका नहीं कोई सानी ,

कुछ कह रहा है सघन वन,

बोल रहा तुम्हारा अंतर्मन ,

बोल रही है हर दिशा ,

कुछ बाँच रही गहरी निशा,

धिक्कार रही है आत्मा 

कब होगा मैं  का खात्मा, 

अहंकार सदा है बोलता,

न ज्ञान पट वह खोलता,

अपनी हांकते, न सुनते हम ,

यही जीवन की त्रासदी,

यही तो है इसका ग़म,

बोलना जहाँ है तुच्छ,

श्रवण है ज्ञान उच्च ,

यही कर लें हम आत्मसात, 

बिगड़ी बन जाये हर बात, 

सहज मिलेगा जीवन ज्ञान

निष्प्राण ज्यों पा जाए प्राण! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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