समय बीतता है
और समय के साथ
हम भी बीतते रहते हैं
फिर एक दिन
बिल्कुल ही बीत जाते हैं
फिर रह जाती हैं समृतियां
खट्टी-मीठी, खोटी-खरी ,
जैसे-जैसे और समय बीतता है
समृतियां भी धुंधलाने लगती हैं
और फिर एक दिन
बिल्कुल ही बिसर जाती हैं
ग़ायब हो जाती हैं मानस-पटल से
मानो कभी कोई था ही नहीं,
खेल ख़त्म, पैसा हज़म!
फिर कहाँ है वह अमरत्व
जिसे हम सदियों से खोज रहे हैं?
संसार में आने से पहले
हम कुछ न थे
जाने के बाद भी कुछ न होंगे
पर यह सत्य हमें भाता नहीं
अहंकार इसे स्वीकारता नहीं
इसलिए हम आजीवन पीछा करते रहते हैं
उस अमरत्व का जो शायद कभी था ही नहीं
भागते रहते हैं उस भ्रम की ओर
जो मात्र मृगतृष्णा है, कुछ और नहीं!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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