कभी तो —

क्यों न दें मिल कर इंसानियत का हवाला 

तभी तो घुप अंधेरा छटेगा, होगा उजाला 

क्यों न हम सब मिल कर दें दुआएँ 

किसी को न दें दर्द, न किसी को रुलायें 

क्यों न मज़लूमों की ओर हाथ हम बढ़ायें 

ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद , ज़ोर-ज़बर से बाज़ आयें 

जंगों के पढ़ क़सीदे  क्यों दुनिया को भरमायें 

क्यों न बन अमन के फ़रिश्ते बंसी चैन की बजाएँ 

कभी तो ख़त्म होगी सूखी तपिश,चलेंगी पुर-नम हवाएँ 

बढ़ेगी जहां में मोहब्बत, परचम फहरायेंगी वफ़ाएँ 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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