जब जागो, प्यारे , तभी सवेरा
देखो दिन है कितना सुनहरा
उमड़ घुमड़ कर बादल आते
अमृतमय वर्षा ये लाते
देखो पंछी मल्हार हैं गाते
उमंगें आशाएँ फ़िज़ा में तिरतीं
मस्त मलंग हवा है फिरती
वनस्पति पुलकित हो झूमे
आओ आनन्दित हो हम घूमें
तितलियाँ फूलों पर मंडरातीं
मकरंद सेवन कर इठलातीं
प्रकृति ने हरी चुनरिया ओढ़ी
प्रभु कृपा यह नहीं है थोड़ी
असंख्य संभावनाएं हमें पुकारें
क्यों न जीवन अपना संवारें ?

अरुण भगत
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