कुछ तो है जो शूल बन के चुभ रहा
कुछ तो है धीरे-धीरे बुझ रहा
कुछ तो है जो कर रहा है आहत
कुछ तो है जो मिटा रहा हर चाहत
कुछ तो है घाव बन के रिस रहा
काल चक्र में है पिस रहा
कुछ तो है जो जाते-जाते कर रहा प्रहार
कर रहा है मूल संवेदनाओं का संहार
निशब्द सब कुछ है कह रहा
दम तोड़ती नदी की भाँति बह रहा
कुछ तो है…
अरुण भगत
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