ज़िंदगी के मरहलों से गुज़रता
मैं सोचता हूँ बस अब और नहीं
बेवजह खाना पीना और नहीं
बेतुका बोलना अब और नहीं
फालतू सोचना अब और नहीं
उठा पटक कतई और नहीं
वक्त की बर्बादी और नहीं
ज़हरीली बातों पे गौर नहीं
आगे दौड़ पीछे चौड़ नहीं
बेचैनी रातों की अब और नहीं
रस्साकशी बातों की और नहीं
भटकना मन का और नहीं
मोह तन का अब और नहीं
अब और नहीं बस और नहीं!
फिर करता हूँ ख़ुद से वादा ख़िलाफ़ी
रह रह कर करता हूँ ख़ुद से बे-इंसाफ़ी
फँस जाता हूँ फिर मकड़ी के जाल में
बह जाता हूँ फिर दुनिया की रौ में
कर लेता हूँ ख़ुद को बे-हाल मैं
लगता है इसी जद्दोजहद में
ख़त्म हो जाएगी ये ज़िंदगी
बह जाएगा वक्त का दरिया
रह जाऊँगा मैं ठगा खड़ा
तोते की मानिंद यूँही रटता
और नहीं बस और नहीं !
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul