कैसा बोझिल समा कैसी ये तन्हाई है
यूँ लगता है जैसे जान पे बन आई है
कैसा ये मंज़र कैसी खुश्क हवाएँ हैं
जिस और देखूँ जफ़ाएँ ही जफ़ाएँ हैं
क्यों कर बोलूँ बोलने पर तो पहरे हैं
किसे सुनाऊँ दास्ताँ सब तो यहाँ बहरे हैं
खुदगर्ज़ी के पहाड़ मुँह बायें खड़े हैं सामने
कौन सूरमा आयेगा बदहाली में हाथ थामने
क्या है ये ज़माना क्या इसकी चाल-ढाल है
ये हाथ नहीं जानता उस हाथ का क्या हाल है
मंज़र = दृश्य, नज़ारा
ज़फ़ा = ज़ुल्म, अन्याय
अरुण भगत
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