दिल की उदासी का सबब न ही पूछिए
आप क्या समझेंगे , हम क्या समझायेंगे
किसी वीराने की गहरी खामोशी है ये
क्या कहें हम , कैसे इसे बतलाएँगे
जी तो किया कुछ बोलकर कर लें दिल हल्का
क्या पता था लफ़्ज़ बेवजह साथ छोड़ जाएँगे
क्यों ग़म के साये मुसलसल गहराये जाते हैं
किस ओर है इशारा, क्या क़हर ये बरपायेंगे
सोचा था सो जायेंगे ख़ुशी की चादर ओड़ कर
क्या ख़बर थी सेज पर खार ही बिछे पाएंगे
है हर तरफ़ नफ़रतों का दौर, जंगों का क़हर
किधर चल पड़ी ये दुनिया, कैसे निज़ात पाएँगे
अरुण भगत
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