भूल जा जो बुरा हुआ
जो हुआ सो हुआ
भूल जा सब ज़्यातियों को
माफ कर दे साथियों को
भूल जा किसी के वैर को
अपना बना ले हर ग़ैर को
भूल जा जो गुज़र गया
जब तूँ जागे है दिन नया
बीती बात तूँ दे बिसार
मौजूदा लम्हे पे हो निसार
माज़ी की गठरी दे उतार
मुस्तक़बिल रहा तुझे पुकार
सब मुआफ़ कर दे दुआ
जो हुआ सो हुआ
मन बोझिल रख न बन नादान
अपने सफ़र को बना आसान
भूल जाना है इक वरदान
जीने का ये गुर ले जान!
अरुण भगत
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