ज़िंदगी के चौराहे पे खड़ा हूँ
असमंजस में पड़ा हूँ
किस रास्ते पे मिलेगा सकून
किस ओर कदम बढ़ाया जाए
कहाँ मिलेगी बहार-ए- वफ़ा
कैसे उस फ़िज़ा को पाया जाए
कहाँ पाएँगे चैन-ओ-सबर
कोई तो मुझे बतलाए
कहाँ छटेंगे ये ग़म के बादल
कहाँ खुशनुमा सहर गुनगुनाए
जहाँ बजती हो अमन की बंसी
कोई हाथ थाम वहाँ ले जाए
ज़िंदगी के चौराहे पे खड़ा हूँ
असमंजस में पड़ा हूँ
कहाँ है वो खुशहाल मंज़र जो
दिल को बाग-बाग कर जाए
अरुण भगत
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