फिक्र थी तो. . .

फिक्र थी तो कभी पूछते हाल 

यूँ न अपनी बेरुख़ी से करते बेहाल 

फ़िक्र  थी तो यूँ न बेवजह हो जाते दूर 

रहते पास बनते मेरी आँखों का नूर

फ़िक्र   थी तो कभी मेरी ओर बढ़ाते हाथ

मोहब्बत से मिलते चलते दो कदम साथ 

फ़िक्र  थी तो इस रिश्ते को पालते पोसते 

न रखते दिल में ख़लिश बेवजह कोसते 

फ़िक्र   थी तो कभी दिखते फ़िक्रमंद  

मेरे नाम कर देते  बेशक़ीमती लम्हे चंद 

मुझे भी लगता कि रखा है मेरा पास 

मुझे भी जाना है तुमने अपना कोई खास 

पर तुमसे भी क्यों कर करें कोई गिला 

इस जहाँ में विरला ही देता है किए का सिला 

अरुण भगत 

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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