अंधे युग की अंधी दौड़
आगे दौड़, पीछे चौड़
अंधे युग की अंधी बातें
सहमे दिन ,काली रातें
अंधे युग की टेढ़ी चाल
रूठे सुर, बिगड़ी ताल
अंधे युग की अंधी भूख
गई समझ की डाली सूख
अंधे युग के विकृत बोल
भरे घावों को देते खोल
अंधे युग में झूठ की जीत
बन गई यह दुनिया की रीत
अंधे युग का यह निर्मम सच
विरला कोई पाया इससे बच!
अरुण भगत
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