क्या छिन गया तुम्हारा
जो उदास हो
क्या लाये थे साथ
जो हताश हो
खाली हाथ आए
खाली हाथ जाना
फिर क्यों बेवजह बुनते हो
ख्वाहिशों का ताना बाना
काहे की रंजिश
काहे का वैर
कौन है अपना
कौन है ग़ैर
कुछ देर के मुसाफ़िर
जाना है कहीं दूर
जहाँ सुरमई शामों में
बसता है इक नूर
उस नूर से ही निकले
उस नूर में समा जाना
बाक़ी तो सब है
इक झूठा फ़साना!
अरुण भगत
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