“You are dust and to dust you shall return.”
के ख़ाक है ये
ख़ाक में मिल जाएगी
फिर कोई और रूप धर
स्वाँग ये रचाएगी
फिर शुरू होगी दौड़-धूप
फिर वही धूप-छाँव
फिर वही कश्मकश
फिर वही शहर- गाँव
यूहीं चलेंगे ये सिलसिले
कहाँ इसका सुराग मिले
कौन रह रह के नचा रहा
हमें दुनियावी पर्दे पे ला रहा
किसने ये बात जानी कि
कहाँ ख़त्म होगी ये कहानी
कहाँ जा थमेगा ये खेल
कब होगा अपने रब से मेल?
अरुण भगत
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