कुदरत तोड़ेगी हमारा ग़ुरूर

ये आसमानों में ठहरा हुआ ज़हरीला धुआँ

ये कन्हैया  की यमुना का झाग-झाग पानी

ये तेज़ी से पिघलते सिमटते बर्फ के तोदे 

बारिशों में क़हर बरपाती पहाड़ी नदियाँ

हमारी मिट्टी में घुल मिल  गया ये ज़हर

बे-दर्दी से सब कुछ झुलसाती गर्मियाँ

फटते और बेतहाशा बरसते ये बादल

दरदराते धंसते हुए हमारे दिलकश पहाड़ 

ज़मीं को निगलते हमारे बे-क़ाबू समंदर

बर्बाद होती फसलें, गुम होती बे-शुमार  नसलें

सब मिल कुछ बोल रहे हैं , हमारी पोल खोल रहे हैं

हमारे किए को तोल रहे हैं, हमारी जड़ें खोद रहे हैं

हो गया है अब ज़बर काफ़ी, नहीं मिलेगी कोई माफ़ी

किए की सज़ा मिलेगी ज़रूर, कुदरत तोड़ेगी हमारा ग़ुरूर

अर्श से फ़र्श पर ले आएगी,शायद तब हमें अक्ल आएगी! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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