तू अब वो नहीं रहा

तू अब वो नहीं रहा 

जो हुआ करता था

 खूबसूरत ख़्वाब बुनता  था

हवाओं से बातें करता था

फ़िज़ाओं में रस घोलता था

प्यार के दो बोल बोलता था

तू तो उम्मीद का दम भरता था

बदलाव की बातें करता था

तुझे ख़ुद पे इतना भरोसा था, तभी तो 

दुनिया संवारने का ख़्याल परोसा था

फिर क्यों तू बैठ गया थक हार के

टिक न पाया आगे ज़िंदगी की मार के

देख, वो तेरे ख़्वाब तुझे पुकारते

निगाहों में हसरत लिए निहारते

सुन रहा है, वो दे रहे हैं सदा

न हो तू रुसवा, उन्हें न दे दगा

उनमें जान फ़ूक, उनकी तामीर कर

बेहतरी का सबब बनना चाहे ग़र

*यह कविता उन सब के नाम है जो जीवन की ऊहापोह और कठिनाइयों के चलते अपने सपनों को छोड़ कर बैठ जाते हैं, हार मान लेते हैं। ऐसा हो भी जाए तो फिर हिम्मत जुटा उन प्रिय सपनों को साकार करने के लिए उठ खड़े होना चाहिए। इसी में जीवन की सार्थकता एवं जीवन का आनंद है। 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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