ये कैसा उसका खेल है

ज़िंदगी का सफ़र बड़ा अजीब है

कोई कोसों दूर

कोई दिल के बहुत क़रीब है

कोई तो रूह तक उतर के

देता है बेपनाह राहत

कोई नश्तर चुभो चुभो  कर

करता बेवजह आहत

कोई ख़ुशबू बन के घुल जाता

फ़िज़ाओं में

कोई घोलता बदगुमानी का ज़हर

हवाओं में 

कोई रूहानी रूह मस्त रहती

अपनी फ़क़ीरी में

कोई बैचेन करवटें बदलता

 ख़ाकी अमीरी में

कोई जंगों के ऐलान कर दिखाते

तबाही के ख़ौफ़नाक मंज़र

कोई घने जंगल उगा देते ज़मीं  पर

जो थी कल तक बंजर

ये ज़िंदगी बेशुमार रंगों का

तिलस्मी मेल है

ख़ुदा की तो ख़ुदा ही जाने

कैसा उसका खेल है! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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