क्यों चाहते हो बोल कर समझाना

क्यों चाहते हो बोल कर समझाना

कहीं बेहतर होगा ख़ामोश रह जाना

किसे समझाओगे क्या समझाओगे

आख़िर इस जद्दोजहद से क्या पाओगे

बहस और तक़रीर से किसी ने क्या पाया

ना करो समझने-समझाने में ख़ुद को ज़ाया

अपनी राह पकड़ो और ख़ुद से बात करो

अपने अंदर के शैतानों से दो-दो हाथ करो

अगर नेक और पाकीज़ा ज़िंदगी करोगे बसर

तुम्हारी खामोशियों का ख़ुद-ब-ख़ुद होगा असर

असरदार शख़्सियतों का रोयाँ-रोयाँ है बोलता

कितनों के मन की अनगिनत गाँठें वो खोलता

बुलंद करो ख़ुद को कि सिर्फ़ तुम्हारी बुलंदी बोले

दिलों को करे रौशन दिमाग़ों के बंद दरवाज़े खोले!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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