पर अपने तू खोल
बुलंद कर अपने बोल,
समय की है यह माँग
झूठी मर्यादाओं को लांघ,
फ़रेब का चहूँ ओर है दंश
न उसके गहरे जाल में फँस,
भीतर के सत्य को दे बल
निष्ठा से जी ले हर पल,
सच्च के साथ जो खड़ा
वही तो है शूरवीर बड़ा,
आत्मा न दांव पर लगा
स्वयं को न दे ऐसी सज़ा,
सत्य न्याय को जिसने जिया
चाहे सतत विषपान किया,
चेतना का तो वही है रक्षक
बाक़ी सब हैं नितांत भक्षक,
उठ, तुझे विवेक पुकारता
क्यों तू है उसे नकारता?
सत्य की नींव पर हो समाज खड़ा
उस ओर तू निरंतर कदम बढ़ा!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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