सब व्यस्त हैं करने में अपनी कथा
कौन जाने किसी के मन की व्यथा
तूती अपनी बजाने में सब ऐसे मस्त
किसे चिंता कौन आहत है, कौन पस्त
अपने राग आलापने में सब यूँ हैं मग्न
किसे दिखे मानवता होती निर्वसन नग्न
हर कोई स्वनिर्मित छद्मजाल में खोया
स्वार्थ का घातक विषैला बीज है बोया
” मैं, मेरा” का बाज़ार है जब इतना गर्म
कौन जाने पर की पीड़ा, किसी का मर्म
कहाँ गए वैष्णव जन जो पीड़ परायी जानें
ग्रास बने कलयुग के जो पर को अपना मानें
गौण इच्छाओं, व्यसनों की अंधी दौड़ है ज़ारी
ले डूबेगी समाज को, पड़ेगी हम सब पर भारी!
अरुण भगत
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