देखो मन कहाँ भागा जा रहा है

देखो मन कहाँ भागा जा रहा है,

इच्छाओं और तृष्णाओं के पीछे,

दिखाने के लिए औरों को नीचे,

दुनिया की चका-चौंध से भ्रमित,

असीमित विषय-वासनाओं से ग्रसित,

खींच रहा है हमें विनाश की ओर,

जहां न दूर तक दिखती कोई भोर,

स्वयं तो गर्त में जा ही रहा है,

हमारे सुख-चैन को भी खा रहा है,

उसके विलासी नाग हमें दिन-रात डसते,

दम घोंटू शिकंजा हम पर कुछ ऐसा कसते

कि समझ न पाएँ हम जाएँ किस ठौर,

कौन समझेगा हमारी वेदना, करेगा गौर?

इस वाचाल वानर जनित बेड़ियाँ काटेगा कौन,

बुद्धि- विवेक कैसे होंगे उज्ज्वल, मन होगा गौण?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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