देखो मन कहाँ भागा जा रहा है,
इच्छाओं और तृष्णाओं के पीछे,
दिखाने के लिए औरों को नीचे,
दुनिया की चका-चौंध से भ्रमित,
असीमित विषय-वासनाओं से ग्रसित,
खींच रहा है हमें विनाश की ओर,
जहां न दूर तक दिखती कोई भोर,
स्वयं तो गर्त में जा ही रहा है,
हमारे सुख-चैन को भी खा रहा है,
उसके विलासी नाग हमें दिन-रात डसते,
दम घोंटू शिकंजा हम पर कुछ ऐसा कसते
कि समझ न पाएँ हम जाएँ किस ठौर,
कौन समझेगा हमारी वेदना, करेगा गौर?
इस वाचाल वानर जनित बेड़ियाँ काटेगा कौन,
बुद्धि- विवेक कैसे होंगे उज्ज्वल, मन होगा गौण?
अरुण भगत
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