ख़ुद ही को ख़ुद का हमदर्द पाया
और कहाँ है जहां में कोई हमसाया
ख़ुद ने ख़ुद से मीठी ज़ुबान बोली
ख़ुद ने ही ख़ुद की गिरह खोली
ख़ुद ही ने ख़ुद को सम्हाला है
ख़ुद ही ख़ुद का दोस्त आला है
ख़ुद ही ने की ख़ुद के लिए ज़हमत
ख़ुद ही ने ख़ुद पर बरसाई रहमत
ख़ुद ने ख़ुद का मुस्तक़बिल संवारा है
ख़ुद को न ख़ुद की नामूसी गवारा है
ख़ुद ने ही ख़ुद का परचम फहराया है
ख़ुद ही तो ख़ुद का तिलिस्मी साया है
*मुस्तक़बिल= future
*नामूसी= humiliation, disgrace
*तिलिस्मी= magical
अरुण भगत
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