मुझे गिला है उनसे
जो सच को सच नहीं कहते
जो झूठ की मार को
चुप-चाप अनचाहे सहते
झूठ को जाने-अनजाने
वो देते बल
नहीं समझते कि
कड़वा होगा उसका फल
नहीं सोचते वो कि
झूठ का यूँ फैलेगा जाल
तो क्या होगी
हमारी गति, हमारा हाल
समय की यह माँग है कि
सच के साथ हों खड़े
अगर चाहते हम कि
लक्ष्य प्राप्त हों बड़े
सच को क्षीण करता
झूठ का हर वार
निस्तेज करती सच को
झूठ की हर मार
जान लें हम कि
यह है आर-पार की घड़ी
असत्य का छद्मजाल है
स्वयं में विपदा बड़ी
यदि समाज को देना चाहें हम
एक स्वस्थ दिशा
तो फिर छँट जानी चाहिए
असत्य की निशा
समय की यह पुकार है
सत्य को दें बल
अगर हम राष्ट्र- प्रहरी चाहें
मातृभूमि का स्वर्णिम कल
क्यों न हम यह मान लें
और लें यह जान
कि सत्य की नींव पर ही
खड़े होते राष्ट्र महान!
*जिन से मुझे गिला है उन में मैं स्वयं भी सम्मिलित हूँ
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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👌👌👌
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आपकी सराहना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, अंकित जी! सत्य के मार्ग पर चलिए और खुश रहिए!
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