नये साल में नई सोच
आज से हर लम्हे को मनाते हैं
उसे अपने ख़्वाबों से सजाते हैं
सुरमई शाम से कुछ रंग चुराते हैं
उनसे अपनी क़िस्मत को लुभाते हैं
हर लम्हे को संवारना है हमारा फ़र्ज़
यह है ज़िंदगी का हम पर क़र्ज़
आओ इस क़र्ज़ को चुकातें हैं
उम्मीदों की शमा हर घर जलाते हैं
लम्हे में ही तो समाया है सब कुछ
इस बात को तुम जान लो सचमुच
लम्हों से ही तो है तारीख़ लिखी जाती
उन्हीं से सदियों की बुनियाद रखी जाती
लम्हों की कोख में ही है सब कुछ पलता
उन्हीं की बदौलत तो हर चिराग़ है जलता
लम्हों को ग़र अपनी बाहों में हम भर लें
उनकी बेपनाह अहमियत को घर कर लें
तो फिर रह जाएगा कुछ न पीछे न आगे
सुलझ जाएँगे पल में ही सब उलझे धागे
लम्हे की जानिब ग़र बढ़ाओगे अपने हाथ
सारी कायनात को खड़ा पाओगे अपने साथ
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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