चलो बनाएँ इक नई दुनिया
जिसमें गाती हो इक मुनिया,
मोहब्बतों के बजते हों ढोल-मंजीरे,
टूट चुकी हों सब ज़ंजीरें,
नफ़रतों के न बाज़ार गरम हों,
दिलों के अंदर एहसास नरम हों,
बजती हो बंसी अमन-चैन की,
रौशन सहर हर स्याह रैन की,
किरदार उमदा हो , इरादे नेक,
रश्क कर उठे ये मुआशरा देख,
जात-पात का न कोई फ़रक हो,
हवस के चलते न कोई गरक हो,
बेवजह खून न बहता हो जंगों में,
इज़ाफ़ा हो दिलख़ुश रंगों में,
बढ़ जाएँ आगे ले हाथों में हाथ!
तबदील होगा हक़ीक़त में ये ख़्वाब
जब कदम मिला सब चलेंगे साथ,
बन जाएगी इक नई दुनिया,
जिसमें गाएगी इक मुनिया,
मोहब्बतों के बजेंगे ढोल-मंजीरे,
टूट जाएँगी सब ज़ंजीरें!
अरुण भगत
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