शूल जहां चुभता नहीं
दीपक जहां बुझता नहीं
इरादे अटल पर्वत समान
गतिशीलता को नहीं विराम
गंगा का जहां सतत् प्रवाह
चैतन्य का है व्योम गवाह
हिमालय जहां गगन को चूमे
राम नाम पर जन-जन झूमे
जप- तप संयम जहां की रीत
घृणा-द्वेष पर भारी प्रीत
समस्त विश्व को कुटुंब जो माने
पवित्र-पावन कण-कण को जाने
जिसके आभूषण पुराण और वेद
जो नहीं करते किन्हीं दो में भेद
ह्रदय-वीणा की जहां धुन है सरल
कहाँ टिक पाए कोई गरल
प्रभु नाम की जहां चहूँ ओर लगन
उस पुण्य धरा को करें नमन!
अरुण भगत
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