कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं

कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं

उत्तर की माँग पर अड़े हैं,

ये सवाल वाक़ई हैं बहुत ढीठ,

न मोड़ सकते तुम उनसे पीठ,

सही-ग़लत न्याय-अन्याय की पूछते बात,

न ये देखें दिन और न ही देखें रात,

अनंत काल से ये यूँ ही अचल अडिग खड़े हैं,

इनको हल करते-करते हम कितने विवादों में पड़े हैं,

पर कहाँ पकड़ पाया है कोई सत्य-असत्य का छोर,

क्या किया है आपने कभी इस बात पर ग़ौर,

ये प्रश्न यूँ ही अधर में लटके रहेंगे,

तकते रहेंगे हमें और कुछ न कहेंगे,

पर ये हमें चैन से जीने भी नहीं देंगे,

यूँ ही प्रत्येक युग में हमारी परीक्षा लेंगे,

चाहे कितनी भी रही हो किसी समय की माँग,

इन शंकाओं का सागर कौन पाया है लांघ?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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