ख़्वाहिशों की राख में है अभी भी इक चिंगारी
कहाँ बुझती है हो जाने की चाहे लाख तैयारी
ख्वाहिशें दम नहीं तोड़तीं ता-ज़िंदगी
न वो पूरी हों न करने दें बंदगी
ख़्वाहिशों का सिलसिला भी बड़ा अजीब है
क्यों वो दिल के इतना क़रीब है
इक पूरी हो तो दूसरी उठाए सर
हर ख्वाहिश पे हम क्यों जाते हैं मर
इतने अरमान लेकर आख़िर कहाँ जाएँगे
कब इनसे दिल से निजात पाएँगे
कब तक हम रातों की नींद गवाएँगे
कब सबर और चैन का परचम फहरायेंगे
क्यों लगे यही ख़लिश ही है हमारी तक़दीर
कहाँ मिले ख़्वाहिशों को फ़ना करने की तदबीर
अरुण भगत
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