मुखौटों के पीछे छिपे लोग
न जाने पालें कितने रोग
बनावट की ज़िंदगी जिएँ
झूठ का रोज़ प्याला पिएँ
सच्च से रहते कोसों दूर
उनकी ज़िंदगी में कहाँ कोई नूर
कहाँ ख़ुशी कहाँ है चैन
जीवन उनका एक लंबी रैन
ज़मीर पे लगाएँ चाहे लाखों पहरे
वजूद में उनके साये गहरे
मुखौटों की भीड़ में ख़ुद ही खो जाते
ज़िंदगी से कोई नेमत नहीं है वो पाते
मुखौटों का भँवर लेता उन्हें नीचे खींच
जब सच्च को देख वो लेते आँखें भींच
मुखौटों के समुंदर में इंसान जब खो जाता
तो कहाँ उसको सकूँ , कहाँ वो सुख पाता
अपने अंतर्मन के सच्च को जो हैं जीते
जीवन का सुमधुर रस वही जन हैं पीते!
अरुण भगत
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