कितनी सुंदर प्रेम की भाषा,
संचरित करती उमंग और आशा,
प्रेम से वन- उपवन महकें,
नाचे मोर, पशु-पक्षी चहकें,
जो रंगे प्रेम के रंग,
हर्ष उल्लास सदा उनके संग,
जिन्होंने निभाई प्रेम की रीत,
उन्हें ही मिला है मन का मीत,
प्रेम का रस है जो पीता,
सही अर्थों में वही है जीता,
प्रेम की तान को जो छेड़ा,
सीधा हो गया जीवन टेड़ा,
प्रेम सुधा ही वैमनस्य का तोड़,
यही है हर खंडन का जोड़,
प्रेम डोर से प्रभु खिंचे चले आते,
साधक प्रेम से ईश्वर-तत्व को पाते,
प्रेम की बंसी जिन्होंने बजाई,
प्रेम की अलख जिन्होंने जगाई ,
उन्होंने ही रोका हर संहार,
उन्होंने ही पाया जीवन सार,
प्रेम में ही है वह शक्ति अपार,
जिससे उद्धृत होगा संसार!
अरुण भगत
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